व्यथा - स्त्री मन की ( डायरी ) मैं स्त्री हूँ .... हाँ, मैं वही स्त्री हूँ, जिसे इस पुरूष प्रधान समाज ने, हमेशा हीं प्रताड़ित किया है | हाँ, वही समाज जिसने, मेरे प्रति अत्याचार किया, व्यभिचार किया और, मेरी इस दयनीय स्थिति का पूर्णत: ज़िम्मेदार भी है | वह समाज मेरा अपराधी है, और मैं उससे पीड़िता, फिर भी हर बार, बारम्बार लान्छन मुझ नि:स्पृह पर हीं लगाया गया और अपराधी भी मुझे हीं ठहराया गया | जिसने मेरा शील भंग किया, मेरे मन का मर्दन, सम्मान का हनन किया, आज वही पुरूष प्रधान समाज मुझे चरित्रहीन बता रहा हा, और अपनी वासना का कलंक मुझ निर्दोषा पर लगा रहा है | क्या कभी सोचा है .... कोई स्त्री कभी स्वेच्छा से क्या चरित्रहीन बनी है ? नहीं ... कभी नहीं ... ऐसा कभी नहीं हुआ | फिर उसे ऐस अवस्था में कौन लाया ? चुप क्यों हो...? क्या जानते नहीं .. य़ा फिर बोलना नहीं चाहते | मैं बताती हूँ.... मुझे ऐसा बनाने वाला ये पुरूष प्रधान समाज हीं है | यहाँ के कुछ दिखावटी चरित्रवान पुरूष, हाँ वही चरित्रवान पुरूष जो सबके सामने अपने चरित्र का ढ़िंढ़ोरा पिटत...
कैसे जिया जाये तुम बिन ? कैसे बताऊँ क्या हो गई ? मेरी ज़िन्दगी तुम बिन, बोझिल सी हो गई, ये ज़िन्दगी तुम बिन, खो गई कहीं दिल की, हर ख़ुशी तुम बिन, गुमसुम सी हो गई, ज़िन्दगी तुम बिन, न चाँद ना सितारे, ना नजारे तुम बिन, नहीं कुछ जीवन में, भाता अब तुम बिन, बहारों के मौसम में भी, उदासी छाई तुम बिन, बसंत भी पतझड़ सा, अब लगे तुम बिन, बहुत सताया है य़ादों ने तेरी, जग भूला तुम बिन, तुम हीं बताओ कि कैसे जिया जाये तुम बिन |
दिल करता है ... ना जीने को दिल करता है, ना हीं मर जाने को; दिल करता है मेरा, सुन्दर - सा नगर बसाने को | जहाँ ना हो चोरी ड़कैती, ना हीं हो मर महँगाई की; जहाँ पाप समझे सब खाना, कमाई हराम की | जो संभाल सके इस, बिगडते हुए ज़माने को; दिल करता है मेरा, ऐसा नगर बसाने को | जहाँ अलग - अलग ना हों, बात गीता, बाईबिल, कुरान की | ना जात-पात, ऊँच-नीच हो, जहाँ सब हों एक समान | जहाँ राम-कृष्ण, नानक , ईसा, सब आयें जीना सीखाने को; दिल करता है मेरा, सुन्दर सा नगर बसाने को |
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