" शिर्षक बदल कविता "
" शिर्षक बदल कविता "
जब महीने में पांचवी बार ,
काव्य पाठ की नौबत आयी ,
शीघ्रता में मैने भी वही कविता ,
शिर्षक बदल फिर एक बार सुनायी |
तभी , श्रोताओ के बीच से ,
एक आवाज जोरदार आयी -
ओये कालिदास के नाती ,
शरम ज़रा भी नहीं आती l
हर बार कई बार बारम्बार ,
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लेखक - " मनोहर " M. K. Srivastava
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