चाह - नव परिवर्तन की ; ऐसी मशाल जलाओ तुम

चाह - नव परिवर्तन की

ऐसी मशाल जलाओ तुम

बुरा वक़्त है जो एक दिन आयेगा,

हौंसले को तुम्हारे जरूर डिगायेगा,

कर्तव्य पथ को प्रकाशित करे जो,

ऐसी मशाल जलाओ तुम |


नहीं आसान है जीवन पथ पर चलना,

मुश्किलें बहुत हैं ज़रा संभल कर रहना,

मंजिल तक तेरी रास्ता पहुँचे जो,

ऐसी राह एक बनाओ तुम |


इंसानों के इस जहाँ में,

काम, क्रोध, द्वेष, लोभ हैं शिखर पर,

मानवता का राग सुनाये जो,

ऐसा संगीत कोई बनाओ तुम |


हिंसा और युद्ध ने किया तबाह,

कराहती इंसानियत है जग में,

अहिंसा - प्रेम सिखलाने फिर एक बार,

ऐसी अशोक बुद्धि जगाओ तुम |


संसार है जिस नारी के दम पर,

अपमान और तिरस्कार उसी का चरम पर,

सुरक्षा और सम्मान दिलाये उसे जो,

ऐसी कोई विधि बनाओ तुम 


इतिहास की बात बहुत हुई,

वर्तमान की आधारशिला पर,

भविष्य स्वर्णिम बना सके जो,

ऐसी विचारधारा बतलाओ तुम |


ऐसा नव परिवर्तन जहाँ में लाओ तुम |

ऐसी मशाल जलाओ तुम |

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